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Thursday, March 1, 2012

कांच

कांच




रुई सी हलकी जिंदगी थी,

जी भर कर जिया मे I

अब्ब तो पत्थर की है,

फिर भी कांच की तरह

संभल संभल के जी रहा हूँ I



................By Me!

Friday, January 13, 2012

कारवां


इतने सालों बाद,

एक मायूस श्याम को

कारवां आज फिर निकला है

तुम्हारे ख्यालों का मेरे दिल से

आज फिर क़यामत होगी

यादें तूफ़ान बनकर कहर ढायेंगी

सुखी आँखें आज फिर पानी बरसाएंगी

दर्द का कारवां निकला तो है

लेकिन कोई नहीं जनता

यह रुकेगा कहाँ!

- By Me

जूनून


यह तुम्हारे जीत का जश्न है!

या मेरे हारने का अफ़सोस

एक जूनून बनकर

जो मेरे लहू में दौड़ता रहता है!



वह आखिर है  क्या बला?

जो रोज़ याद दिलाती है!

यह तो सिर्फ मिल का पत्थर

मंजिल तो अभी और भी आगे है!

- By Me!

Incidentally this is also my first post in Hindi!